कौन कहता है की चाणक्य बिना चन्द्रगुप्त नहीं बन सकता
इसके लिए थोड़ा जूनून जगाना पड़ता
और लक्ष्य के प्रति समर्पण की अग्नि में खुद को जलाना पड़ता
इसके लिए थोड़ा साहस अपने अंदर लाना पड़ता है
लोहे की तरह आदर्शो की अग्नि में खुद को जलाना पड़ता है
याद रहे विजयश्री उसकी नहीं होती जो
दूध की तरह स्थिर रहना चाहता है
विजयश्री उसकी होती है जो
दूध से घी बनकर
घी की तरह जलना जनता है
( दूध सिर्फ एक व्यक्ति को स्वस्थ रख सकता है। मगर उसी दूध से बना घी जब जलता है
तो उससे न केवल अंधकार दूर होता है ब्लकि उसके जलने से आस पास का पर्यावरण भी शुद्ध होता है )
इसके लिए थोड़ा जूनून जगाना पड़ता
और लक्ष्य के प्रति समर्पण की अग्नि में खुद को जलाना पड़ता
इसके लिए थोड़ा साहस अपने अंदर लाना पड़ता है
लोहे की तरह आदर्शो की अग्नि में खुद को जलाना पड़ता है
याद रहे विजयश्री उसकी नहीं होती जो
दूध की तरह स्थिर रहना चाहता है
विजयश्री उसकी होती है जो
दूध से घी बनकर
घी की तरह जलना जनता है
( दूध सिर्फ एक व्यक्ति को स्वस्थ रख सकता है। मगर उसी दूध से बना घी जब जलता है
तो उससे न केवल अंधकार दूर होता है ब्लकि उसके जलने से आस पास का पर्यावरण भी शुद्ध होता है )